Nazm by Rekhta Pataulvi

इक तरफ़ लहलहाता चमन ज़िंदगी
इक तरफ़ है ख़िज़ाँ और घुटन ज़िंदगी
इक तरफ़ हिम्मत-ओ-हौसला, अज़्म भी
इक तरफ उल्झनें और थकन ज़िंदगी
ज़िंदगी एक पहेली है और खुद ही हल
अब कहो क्या है ऐ अहले फ़न ज़िंदगी
नींद भी ख्वाब भी और ताबीर भी
इक तिलस्म-ए- पुरअसरार-ओ- फ़न ज़िंदगी
सल्तनत, तख्त-ओ-ताज और शहंशाह भी
तौक़, ज़ंजीरें, दार-ओ-रसन ज़िंदगी
सरहदों पर निगहबान भी,घात भी
मौजज़न ज़िंदगी, दिलशिकन ज़िंदगी
ये ही जश्न-ओ-चराग़ाँ है और क़हक़हे
मातम-ओ-मर्सिया, नौहाज़ान ज़िंदगी
ये ही शतरंज के मोहरे, ये ही बिसात
हार और जीत का एक चलन ज़िंदगी
रहगुज़र भी है राही भी मंज़िल भी खुद
राहबर भी ज़िंदगी राहज़न ज़िंदगी
खुद हक़ीक़त है और खुद ही अफसाना भी
राज़ है अज़- ज़मीं तागगन ज़िंदगी
ये ही महफिल भी हंगामा सन्नाटा भी
खुद ही संजीदा खुद बाँकपन ज़िंदगी
ज़िंदगी है के पानी का इक बुलबुला
फिर भी है किस क़दर मौजज़न ज़िंदगी
है यही ज़िंदगी एक फूलों की सेज
और कभी कांटों की है चुभन ज़िंदगी
आशना और शनासा भी अंजान भी
बावतन ज़िंदगी बेवतन ज़िंदगी
Rekhta Pataulvi